उत्तर प्रदेश के स्कूलों में अभिभावकों को मिली बड़ी जिम्मेदारी, अब माता-पिता बनेंगे एसएमसी अध्यक्ष

उत्तर प्रदेश के स्कूलों में अभिभावकों को मिली बड़ी जिम्मेदारी, अब माता-पिता बनेंगे एसएमसी अध्यक्ष

उत्तर प्रदेश के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में अब अभिभावकों की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होने जा रही है। शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और बच्चों की पढ़ाई को बेहतर बनाने के लिए केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने नई व्यवस्था लागू की है। इसके तहत अब विद्यालय प्रबंधन समिति यानी एसएमसी का अध्यक्ष किसी शिक्षक या बाहरी व्यक्ति की जगह बच्चों के माता-पिता या अभिभावक ही बनेंगे। इस फैसले को शिक्षा क्षेत्र में बड़ा बदलाव माना जा रहा है, क्योंकि अब स्कूलों के संचालन और विकास में सीधे तौर पर अभिभावकों की भागीदारी बढ़ेगी।

नई व्यवस्था के अनुसार प्रदेश के सभी विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र शुरू होने के एक महीने के भीतर एसएमसी का गठन करना अनिवार्य होगा। यह नियम माध्यमिक स्तर यानी कक्षा 12 तक के स्कूलों पर लागू किया जाएगा। अब तक कई स्कूलों में विद्यालय प्रबंधन विकास समिति यानी एसएमडीसी काम कर रही थी, लेकिन अब उसकी जगह एसएमसी को लागू किया जाएगा। सरकार का मानना है कि जब अभिभावक सीधे स्कूल प्रबंधन से जुड़ेंगे तो बच्चों की पढ़ाई, अनुशासन और सुविधाओं पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा।

इस नई व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि समिति में अभिभावकों को सबसे अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया है। एसएमसी के कुल सदस्यों में 75 प्रतिशत हिस्सा बच्चों के माता-पिता या संरक्षकों का होगा। वहीं बाकी 25 प्रतिशत सदस्यों में स्थानीय निकाय प्रतिनिधि, शिक्षक, शिक्षाविद, विषय विशेषज्ञ, पूर्व छात्र और आंगनबाड़ी, आशा व एएनएम कार्यकर्ताओं को शामिल किया जाएगा। इससे स्कूलों में केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक भागीदारी भी बढ़ेगी। शिक्षा विभाग का मानना है कि जब समाज और परिवार दोनों स्कूल से जुड़ेंगे तो शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार तेजी से दिखाई देगा।

समिति का आकार स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या के आधार पर तय किया जाएगा। जिन स्कूलों में 100 तक छात्र हैं, वहां 12 से 15 सदस्य होंगे। 100 से 500 छात्रों वाले स्कूलों में 15 से 20 सदस्य रखे जाएंगे, जबकि 500 से अधिक छात्र संख्या वाले स्कूलों में 20 से 25 सदस्य शामिल किए जाएंगे। खास बात यह भी है कि कुल सदस्यों में कम से कम 50 प्रतिशत महिलाएं होंगी। इसका उद्देश्य महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और बच्चों की शिक्षा में माताओं की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करना है। स्कूल के प्राचार्य समिति के सदस्य सचिव होंगे और उन्हें समय पर समिति का गठन सुनिश्चित करना होगा।

सरकार ने एसएमसी की जिम्मेदारियां भी स्पष्ट कर दी हैं। समिति को हर महीने बैठक करना अनिवार्य होगा। इन बैठकों में स्कूल की पढ़ाई, बच्चों की उपस्थिति, संसाधनों के उपयोग और सरकारी योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की जाएगी। इसके अलावा समिति विद्यालय विकास योजना तैयार करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि समग्र शिक्षा, पीएम श्री और पीएम पोषण जैसी योजनाओं का लाभ सही तरीके से बच्चों तक पहुंचे। स्कूलों में मिलने वाले भोजन, साफ-सफाई, भवन मरम्मत और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे विषयों पर भी समिति नजर रखेगी।

नई व्यवस्था के तहत अभिभावक-शिक्षक बैठक यानी पीटीएम को भी अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश की जाएगी। अब माता-पिता केवल बच्चों के रिजल्ट जानने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पढ़ाई में सुधार के सुझाव भी दे सकेंगे। इससे स्कूल और परिवार के बीच बेहतर तालमेल बनेगा। कई शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब अभिभावकों को जिम्मेदारी मिलती है तो बच्चों की पढ़ाई में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलता है। बच्चे भी खुद को ज्यादा सुरक्षित और प्रेरित महसूस करते हैं।

शिक्षा विभाग ने समिति के कामकाज की निगरानी के लिए भी व्यवस्था बनाई है। ब्लॉक और जिला स्तर के अधिकारी साल में कम से कम दो बार एसएमसी के कार्यों की समीक्षा करेंगे। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि समितियां केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि जमीन पर भी सक्रिय रूप से काम करें। अगर किसी स्कूल में समिति सही तरीके से काम नहीं करती है तो अधिकारियों द्वारा आवश्यक कार्रवाई भी की जा सकती है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा, पुस्तक वितरण और पोषण योजनाओं पर काफी काम हुआ है। अब सरकार चाहती है कि अभिभावकों को भी शिक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा बनाया जाए। इससे बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ स्कूलों में जवाबदेही भी बढ़ेगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में यह बदलाव और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कई बार अभिभावकों को स्कूल की व्यवस्थाओं की पूरी जानकारी नहीं मिल पाती थी, लेकिन अब वे सीधे निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे। इससे स्कूलों की समस्याएं जल्दी सामने आएंगी और उनके समाधान में भी तेजी आएगी। खासकर छात्राओं की शिक्षा, सुरक्षा और नियमित उपस्थिति पर इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश के स्कूलों में लागू की जा रही यह नई व्यवस्था शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। अभिभावकों को एसएमसी अध्यक्ष बनाने का फैसला केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह बच्चों की बेहतर शिक्षा और स्कूलों में पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश भी है। आने वाले समय में इसका असर स्कूलों की गुणवत्ता और बच्चों के भविष्य पर साफ दिखाई दे सकता है।

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