बिना TET पढ़ाने वाले सभी कैडरों पर बढ़ा संकट! Article 21A पर Supreme Court की सख्ती, जानिए
उत्तर प्रदेश से लेकर जम्मू-कश्मीर तक, इस समय देश के बेसिक शिक्षा विभाग में एक बहुत बड़ी हलचल मची हुई है। अगर आप भी एक शिक्षामित्र हैं, अनुदेशक हैं या किसी भी राज्य में बिना टीईटी (TET) पास किए कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, तो यह खबर सीधे तौर पर आपके भविष्य से जुड़ी है। शिक्षा के अधिकार यानी Article 21A को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख इस समय बेहद कड़ा नजर आ रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत से आ रहे फैसलों ने उन हजारों-लाखों संविदा शिक्षकों की धड़कनें बढ़ा दी हैं, जो सालों से न्यूनतम मानदेय पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इस पूरे मामले पर जाने-माने कानूनी पैरोकार हिमांशु राणा ने एक बड़ा और गंभीर इशारा किया है, जिसे समझना हर प्रभावित शिक्षक के लिए बेहद जरूरी है।
दरअसल, यह पूरा मामला शिक्षा की गुणवत्ता और कानूनी अनिवार्यताओं से जुड़ा हुआ है। हिमांशु राणा ने साफ तौर पर कहा है कि जम्मू-कश्मीर की ‘रहबर-ए-तालीम’ (Rehbar-e-Taleem) स्कीम काफी हद तक उत्तर प्रदेश की शिक्षामित्र योजना या राजस्थान के ‘अध्यापक मित्र’ जैसी ही है। इन सभी योजनाओं का मूल उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा को जमीनी स्तर पर मजबूत करना था। लेकिन अब कानूनी पेच फंस चुका है। उन्होंने सोशल मीडिया पर आगाह करते हुए लिखा है कि जो भी लोग इस तरह की स्कीम के तहत एलीमेंट्री एजुकेशन (Elementary Education) में अपना योगदान दे रहे हैं, उन्हें तुरंत सचेत हो जाना चाहिए। उन्हें ‘अंजुमन’ और जम्मू-कश्मीर वाले अदालती फैसलों को अपने-अपने वकीलों के माध्यम से गहराई से समझना होगा और समय रहते इसकी ठोस न्यायिक काट खोजनी होगी, वरना आगे की राह बहुत मुश्किल हो सकती है।
इस स्थिति की गंभीरता को समझाने के लिए हिमांशु राणा ने एक बहुत ही सटीक और तीखा उदाहरण दिया है। उन्होंने कहा कि “सुप्रीम कोर्ट का रथ इस वक्त भल्लालदेव के रथ जैसा चल रहा है, जो बिना TET के कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाता दिख रहा है, सबको काटता जा रहा है।” यह बात सुनने में भले ही कड़वी लगे, लेकिन मौजूदा कानूनी हालातों की हकीकत बयां करती है। पूरे देश में (Pan India) मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार (Article 21A) को हूबहू लागू करने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय इस समय सख्त चाबुक चला रहा है। अदालत का साफ मानना है कि बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी मिलनी चाहिए, जिसके लिए TET एक अनिवार्य योग्यता है।
अब सवाल यह उठता है कि इन हजारों परिवारों का क्या होगा जो सालों से इस व्यवस्था का हिस्सा हैं? सालों तक स्कूलों में अपनी जिंदगी खपाने के बाद आज इन शिक्षकों के सामने अचानक योग्यता साबित करने का जो संकट खड़ा हुआ है, वह मानसिक और भावनात्मक रूप से तोड़ देने वाला है। लेकिन कानून भावुकता से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और नियमों से चलता है। हिमांशु राणा ने स्पष्ट किया है कि वे किसी को डरा नहीं रहे हैं, बल्कि सिर्फ आने वाले खतरे के प्रति आगाह कर रहे हैं। ऐसे में सभी प्रभावित कैडरों के संगठन और उनके कानूनी सलाहकारों को एकजुट होकर, सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए और अपने सुरक्षित भविष्य के लिए एक मजबूत कानूनी रणनीति तैयार करनी चाहिए, क्योंकि अब लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं बची है।