हाईकोर्ट में सोलर का धमाका! 5 लाख से 2 लाख पर आया बिजली बिल – Latest Update

हाईकोर्ट में सोलर का धमाका! 5 लाख से 2 लाख पर आया बिजली बिल – Latest Update

हाईकोर्ट में सोलर पावर का कमाल: बिजली बिल आधा, ग्रीन एनर्जी की बड़ी मिसाल बिजली खर्च कम करना आसान नहीं होता। खासकर बड़े सरकारी परिसरों में। लेकिन झारखंड हाईकोर्ट ने यह कर दिखाया है। latest update के मुताबिक, हाईकोर्ट परिसर में सोलर पावर से करीब 2000 किलोवाट (2 मेगावाट) तक उत्पादन हो रहा है। नतीजा साफ है—बिजली बिल अब लगभग आधा हो चुका है। ज्रेडा की पहल: कोयला से आगे, अब ग्रीन एनर्जी पर जोर झारखंड नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी (JREDA) राज्य में ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी संभाल रही है। यह झारखंड ऊर्जा विभाग की अहम इकाई है। official announcement के अनुसार, एजेंसी ने अब तक 60 मेगावाट सोलर बिजली उत्पादन का लक्ष्य हासिल कर लिया है। यह कदम कोल बेस्ड थर्मल पावर पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

हाईकोर्ट परिसर में सोलर प्लांट: दोहरा फायदा

झारखंड हाईकोर्ट परिसर में पार्किंग शेड की छत पर सोलर पैनल लगाए गए हैं। यह फैसला व्यावहारिक भी है। एक तरफ गाड़ियों को बारिश और धूप से सुरक्षा मिलती है। दूसरी तरफ, जमीन की कमी की समस्या भी नहीं रहती। नए भवन के बनने के बाद यहां करीब 2 मेगावाट का सोलर प्लांट स्थापित किया गया। पहले जहां हर महीने 4.5 से 5 लाख रुपये तक बिजली बिल आता था, अब वह करीब 2 लाख रुपये के आसपास रह गया है। यानी खर्च आधे से भी कम। यह सिर्फ बचत नहीं, बल्कि एक मॉडल है जिसे दूसरे संस्थान भी अपना सकते हैं।

कहां-कहां हो रहा है सोलर से उत्पादन?

ज्रेडा ने सिर्फ हाईकोर्ट तक खुद को सीमित नहीं रखा। राज्य के करीब 2900 परिसरों में सोलर प्लेट लगाए जा चुके हैं।

मुख्य आंकड़े इस प्रकार हैं सभी सिविल व अन्य कोर्ट: 3.5 मेगावाट डीसी ऑफिस: 2 मेगावाट सरकारी अस्पताल व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र: 7 मेगावाट 700 सरकारी स्कूल: 12 मेगावाट 300 थाना: 4 मेगावाट विश्वविद्यालय व कॉलेज: 25 किलोवाट हाईकोर्ट: 2 मेगावाट विधानसभा: 600 किलोवाट यह आंकड़े दिखाते हैं कि सरकारी भवनों में government benefits का सीधा असर दिखाई दे रहा है।

नेट मीटरिंग कैसे घटा रही है बिल?

सोलर सिस्टम की असली ताकत है नेट मीटरिंग।दिन में धूप से जितनी बिजली बनती है, वह सीधे मीटर से जुड़कर इस्तेमाल होती है। अगर उत्पादन ज्यादा है, तो वह मुख्य बिल में एडजस्ट हो जाता है। यानी जितनी यूनिट सोलर से बनी, उतनी यूनिट का भुगतान कम। यह important guidelines के तहत काम करता है और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है। सरल शब्दों में कहें तो—सूरज की रोशनी जितनी तेज, बिल उतना हल्का।

आगे की योजना और संभावनाएं

ज्रेडा का लक्ष्य आने वाले वर्षों में सोलर पावर उत्पादन और बढ़ाना है। सरकारी भवनों के बाद निजी संस्थानों और आम उपभोक्ताओं के लिए भी online process, eligibility और official details को आसान बनाया जा रहा है। अगर इसी तरह हर बड़े परिसर में सोलर प्लांट लग जाए, तो राज्य का ऊर्जा परिदृश्य पूरी तरह बदल सकता है।

निष्कर्ष

हाईकोर्ट परिसर में सोलर पावर का प्रयोग यह साबित करता है कि ग्रीन एनर्जी सिर्फ पर्यावरण की बात नहीं, बल्कि आर्थिक समझदारी भी है। बिल आधा होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। और यह शुरुआत है—आने वाले समय में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल सकते हैं।

Leave a Comment