पेट्रोल–डीजल पर भारी घाटा: तेल कंपनियों को हर दिन हजारों करोड़ का नुकसान

पेट्रोल–डीजल पर भारी घाटा: तेल कंपनियों को हर दिन हजारों करोड़ का नुकसान

कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज उछाल ने देश की सरकारी तेल कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ताज़ा latest update के मुताबिक, भारत की प्रमुख तेल कंपनियां हर लीटर पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर बड़ा घाटा झेल रही हैं। मौजूदा हालात ऐसे हैं कि कंपनियों को पेट्रोल पर लगभग ₹20 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹50 प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

इसका सीधा असर उनके दैनिक खर्च पर दिखाई दे रहा है। अनुमान है कि देश में पेट्रोल-डीजल की बिक्री के कारण तेल कंपनियों को रोज़ाना करीब ₹2000 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ रहा है।

2. रिपोर्ट में सामने आए आधिकारिक आंकड़े

एक हालिया रिपोर्ट में official details सामने आई हैं कि देश की तीन प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां —

इंडियन ऑयल

भारत पेट्रोलियम

हिंदुस्तान पेट्रोलियम

को लगातार नुकसान झेलना पड़ रहा है। विश्लेषण के अनुसार, रोजाना पेट्रोल की बिक्री में लगभग ₹350 करोड़ और डीजल में भी करीब ₹350 करोड़ का घाटा हो रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद सरकार ने अभी तक घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए हैं। यही वजह है कि कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ता जा रहा है।

3. कच्चे तेल की कीमतें क्यों बढ़ीं?

ऊर्जा बाजार पर वैश्विक हालात का बड़ा असर पड़ता है। युद्ध जैसे तनावपूर्ण हालात बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं।

युद्ध से पहले जहां कच्चा तेल लगभग 60 से 69 डॉलर प्रति बैरल के बीच था, वहीं बाद में यह बढ़कर करीब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री मार्गों में बाधा, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण रास्तों पर दबाव बढ़ने से तेल सप्लाई पर असर पड़ा है। भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो जाती है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है।

4. भारत के पास कितना तेल भंडार है?

हालांकि बढ़ती कीमतों के बीच राहत की बात यह है कि भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पहले से ही पर्याप्त भंडारण तैयार कर रखा है।

सरकारी रणनीति के तहत देश के पास लगभग 70 दिनों का रणनीतिक तेल भंडार मौजूद है। इसके अलावा करीब 20 दिनों का आपातकालीन रिजर्व भी रखा गया है।

इसका मतलब यह है कि यदि अंतरराष्ट्रीय सप्लाई कुछ समय के लिए प्रभावित भी हो जाए, तो भी देश में तुरंत ईंधन संकट की स्थिति बनने की संभावना कम है।

5. रूस से तेल आयात बढ़ाने की तैयारी

ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखने के लिए भारत लगातार नए विकल्प तलाश रहा है। पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के लिए कच्चे तेल का एक अहम सप्लायर बनकर उभरा है।

बीते समय में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण भारत ने रूस से तेल आयात में थोड़ी कटौती की थी। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं और संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में भारत रूस से फिर अधिक मात्रा में कच्चा तेल खरीद सकता है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को अपेक्षाकृत कम कीमत पर तेल मिलने की संभावना बढ़ सकती है, जिससे तेल कंपनियों के नुकसान में कुछ राहत मिल सकती है।

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