UP : वाराणसी के सरकारी स्कूलों में छात्राओं ने उगाईं सब्जियां, अब मिड-डे मील में परोसी जाएगी अपनी ही मेहनत की फसल

UP : वाराणसी के सरकारी स्कूलों में छात्राओं ने उगाईं सब्जियां, अब मिड-डे मील में परोसी जाएगी अपनी ही मेहनत की फसल

सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के साथ-साथ अब बच्चों को जीवन से जुड़ी व्यावहारिक सीख भी दी जा रही है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में ऐसा ही एक दिलचस्प और प्रेरणादायक प्रयोग सामने आया है, जहां छात्राओं ने स्कूल परिसर में सब्जियां उगाकर शिक्षा और पोषण को एक साथ जोड़ दिया है।

इस पहल की खास बात यह है कि अब इन स्कूलों में मिड-डे मील की थाली में वही सब्जियां परोसी जाएंगी, जिन्हें खुद छात्राओं ने बोया, सींचा और तैयार किया है।

1. छात्राओं ने खाली जमीन को बना दिया हरा-भरा बगीचा

वाराणसी के चोलापुर ब्लॉक के परिषदीय विद्यालयों में छात्राओं ने स्कूल की खाली पड़ी जमीन को एक छोटे खेत में बदल दिया।

कंपोजिट पूर्व माध्यमिक विद्यालय, पठखौली, पूर्व माध्यमिक विद्यालय भदवा और पूर्व माध्यमिक विद्यालय निया की छात्राओं ने मिट्टी तैयार करने से लेकर बीज बोने और पौधों की देखभाल तक हर काम खुद किया।

कह सकते हैं कि यह पढ़ाई का ऐसा तरीका है जिसमें किताबों से ज्यादा अनुभव सिखाता है।

2. ‘Learning by Doing’ मॉडल का अनोखा उदाहरण

यह पहल सरकार की “लर्निंग बाय डुइंग” यानी करके सीखने की योजना के तहत शुरू की गई है।

इस मॉडल में बच्चों को सिर्फ सिद्धांत नहीं पढ़ाया जाता, बल्कि उन्हें वास्तविक काम करके सीखने का मौका दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर छात्राएं अब खेती की मूल बातें—जैसे बीज बोना, पौधों की देखभाल, सिंचाई और जैविक खाद का उपयोग—खुद करके समझ रही हैं।

3. पोषण वाटिका से मिड-डे मील होगा और पौष्टिक

सरकारी स्कूलों में बच्चों को पौष्टिक भोजन देने के लिए पोषण वाटिका (Nutrition Garden) बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

इसी के तहत इन स्कूलों में पालक, टमाटर, बैंगन, मिर्च और अन्य मौसमी सब्जियां उगाई गई हैं। सबसे खास बात यह है कि ये सब्जियां रसायनों और कीटनाशकों से मुक्त हैं, इसलिए बच्चों के लिए ज्यादा सुरक्षित और पौष्टिक मानी जा रही हैं।

ग्रामीण इलाकों में जहां कुपोषण की समस्या अभी भी चुनौती बनी हुई है, वहां ऐसे छोटे-छोटे प्रयास बड़े बदलाव ला सकते हैं।

4. बच्चों को मिल रही किताबों से अलग सीख

इस पहल से बच्चों को सिर्फ पोषण ही नहीं, बल्कि कई जरूरी जीवन कौशल भी सीखने को मिल रहे हैं।

खेती के जरिए छात्राएं पौधों का जीवन चक्र, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का महत्व भी समझ रही हैं। यह अनुभव आगे चलकर उनके आत्मविश्वास और व्यवहारिक ज्ञान को मजबूत करता है।

5. क्या कहते हैं अधिकारी (Official Details)

चोलापुर के खंड शिक्षाधिकारी नागेंद्र सरोज के अनुसार, इस गतिविधि का मकसद बच्चों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखना है।

उनका कहना है कि “लर्निंग बाय डुइंग पद्धति के माध्यम से छात्राएं कृषि विज्ञान, पौधों के जीवन चक्र और पर्यावरण संरक्षण को बेहतर तरीके से समझ रही हैं। इससे पढ़ाई भी रोचक बनती है और बच्चों को व्यावहारिक ज्ञान भी मिलता है।”

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