हेडमास्टर को सरप्लस घोषित करने पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार के आदेश पर लगी रोक

हेडमास्टर को सरप्लस घोषित करने पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार के आदेश पर लगी रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा आदेश देते हुए हेडमास्टरों को सरप्लस घोषित करने की प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह मामला उन प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों से जुड़ा है जहां छात्र संख्या 150 से कम है। राज्य सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार ऐसे विद्यालयों में प्रधानाध्यापक का पद शून्य माना जा रहा था और वहां तैनात हेडमास्टरों को अधिशेष शिक्षक मानकर समायोजित करने की तैयारी की जा रही थी। हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित परिपत्र के एक हिस्से को स्थगित कर दिया है।

यह मामला “आलोक गिरी एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य” शीर्षक से दाखिल याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि सरकार द्वारा जारी 16 अगस्त 2024 के परिपत्र में यह व्यवस्था की गई थी कि जिन विद्यालयों में छात्र संख्या 150 से कम है वहां कार्यरत हेडमास्टर या हेडमिस्ट्रेस को सरप्लस माना जाएगा। इसके आधार पर उनके स्थानांतरण और समायोजन की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह व्यवस्था नियमों और कानून की भावना के विपरीत है।

याचिका में यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम 1972 तथा शिक्षक सेवा नियमावली 1981 और 2008 के अनुसार हेडमास्टर भी शिक्षक की श्रेणी में आते हैं। नियमों में शिक्षक की परिभाषा में उन सभी व्यक्तियों को शामिल किया गया है जो विद्यालय में बच्चों को शिक्षा प्रदान करते हैं। ऐसे में केवल छात्र संख्या कम होने के आधार पर हेडमास्टरों को अलग श्रेणी में रखकर सरप्लस घोषित करना उचित नहीं है।

कोर्ट के सामने यह भी तर्क रखा गया कि बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में छात्र-शिक्षक अनुपात का प्रावधान जरूर है, लेकिन उसमें यह कहीं नहीं कहा गया कि 150 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में हेडमास्टर का पद समाप्त कर दिया जाए। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने कहा कि सरकार ने अधिनियम की गलत व्याख्या करते हुए यह निर्णय लिया है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि यह परिपत्र छात्र-शिक्षक अनुपात को संतुलित करने के उद्देश्य से जारी किया गया है। सरकार का तर्क था कि कई विद्यालय ऐसे हैं जहां प्रधानाध्यापक का पद रिक्त है और वहां आवश्यकता के अनुसार समायोजन किया जाना जरूरी है। यह भी कहा गया कि अभी तक किसी हेडमास्टर का वास्तविक स्थानांतरण नहीं किया गया है, इसलिए याचिका केवल आशंका पर आधारित है।

हालांकि अदालत ने सरकार की इस दलील को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ताओं के तर्कों में बल दिखाई देता है और मामले पर विस्तृत विचार की आवश्यकता है। इसी आधार पर अदालत ने विपक्षी पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया और अंतरिम राहत प्रदान की।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि अगले आदेश तक 16 अगस्त 2024 के परिपत्र का वह हिस्सा प्रभावी नहीं रहेगा जिसमें 150 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों के हेड टीचर को अधिशेष मानने की बात कही गई है। साथ ही यह भी निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ताओं के वर्तमान कार्य और पद को प्रभावित नहीं किया जाएगा।

इस आदेश के बाद प्रदेश के हजारों प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों को बड़ी राहत मिली है। लंबे समय से यह आशंका बनी हुई थी कि कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में कार्यरत हेडमास्टरों को सरप्लस घोषित कर अन्य विद्यालयों में भेजा जा सकता है। हाईकोर्ट के इस फैसले से फिलहाल ऐसी कार्रवाई पर रोक लग गई है।

शिक्षक संगठनों ने भी अदालत के इस आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि केवल छात्र संख्या के आधार पर प्रधानाध्यापक का पद समाप्त करना शिक्षा व्यवस्था के हित में नहीं होगा। विद्यालयों में प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हेडमास्टर का पद आवश्यक है। यदि इस पद को समाप्त किया जाता है तो विद्यालय संचालन प्रभावित हो सकता है।

अब इस मामले की अगली सुनवाई में सरकार अपना विस्तृत जवाब दाखिल करेगी। इसके बाद अदालत तय करेगी कि सरकार का आदेश नियमों और कानून के अनुरूप है या नहीं। फिलहाल हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश ने बेसिक शिक्षा विभाग में चल रही सरप्लस प्रक्रिया को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

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