जनगणना ड्यूटी में शिक्षकों का अपमान बर्दाश्त नहीं, शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन ने जताई नाराजगी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में चल रहे जनगणना कार्य के बीच शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ हो रहे कथित असम्मानजनक व्यवहार को लेकर अब शिक्षक संगठनों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए प्रशासन से तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य में लगे शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव बनाया जा रहा है, जिससे उनके सम्मान और मानसिक स्थिति पर असर पड़ रहा है। यह मामला अब केवल ड्यूटी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शिक्षकों की गरिमा और कार्य वातावरण से भी जुड़ गया है।
प्रदेश अध्यक्ष संतोष तिवारी ने कहा कि शिक्षक हमेशा से सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों में अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते आए हैं। चाहे चुनाव ड्यूटी हो, सर्वे कार्य हो या फिर जनगणना जैसा बड़ा अभियान, शिक्षकों ने हर बार सरकार का सहयोग किया है। लेकिन कई जिलों से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि अधिकारियों द्वारा शिक्षकों को डांटना-फटकारना और अनावश्यक दबाव बनाना आम बात हो गई है। उन्होंने कहा कि प्रशासन को सहयोगात्मक माहौल बनाना चाहिए, ताकि कर्मचारी बेहतर तरीके से अपना कार्य कर सकें। डर और दबाव के माहौल में किसी भी काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
प्रदेश महासचिव दिलीप चौहान ने बताया कि कई स्थानों पर शिक्षकों के साथ असम्मानजनक व्यवहार की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। उन्होंने कहा कि जनगणना कार्य के पहले चरण के लिए 22 मई से 20 जून तक की समयावधि निर्धारित की गई है। ऐसे में अनावश्यक जल्दबाजी और मानसिक दबाव बनाना पूरी तरह अनुचित है। संगठन का मानना है कि अगर कर्मचारियों को सम्मान और सहयोग मिलेगा, तो जनगणना कार्य अधिक प्रभावी और व्यवस्थित तरीके से पूरा किया जा सकेगा।
विनीत सिंह ने आरोप लगाया कि कुछ तहसीलों और जनपदों में राजस्व विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा शिक्षकों के साथ कठोर व्यवहार किया जा रहा है। उन्होंने इसे निंदनीय बताते हुए कहा कि शिक्षकों को सरकारी मशीनरी का कमजोर हिस्सा समझना गलत है। वहीं वरिष्ठ उपाध्यक्ष शालिनी मिश्रा ने ड्यूटी आवंटन में अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि कई सक्षम और प्रशिक्षित शिक्षकों की ड्यूटी काट दी गई, जबकि कुछ कर्मचारियों को बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के दूरदराज क्षेत्रों में भेज दिया गया। इससे न केवल कार्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि कर्मचारियों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
प्रदेश सचिव राकेश तिवारी और संयुक्त मंत्री अरुण कुमार ने मांग की कि जनगणना ड्यूटी आवंटन में हुई विसंगतियों की निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए। उन्होंने कहा कि जिन कर्मचारियों को बिना कारण हटाया गया है या जिनके साथ अन्याय हुआ है, उन्हें न्याय मिलना चाहिए। वहीं प्रदेश मंत्री तारकेश्वर शाही और संगठन मंत्री राजकुमार चौधरी ने साफ शब्दों में कहा कि शिक्षकों के सम्मान, स्वास्थ्य और अधिकारों की अनदेखी किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।
दरअसल, जनगणना जैसे बड़े अभियान में शिक्षकों की भूमिका बेहद अहम होती है। वे गांव-गांव और शहर-शहर जाकर आंकड़े जुटाते हैं, लोगों से संपर्क करते हैं और प्रशासन को सही जानकारी उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में अगर उनके साथ अपमानजनक व्यवहार होगा, तो इसका असर कार्य की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन और कर्मचारियों के बीच बेहतर समन्वय होना जरूरी है, तभी इतने बड़े स्तर के अभियान सफल हो सकते हैं।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी कर्मचारियों, खासकर शिक्षकों, को केवल अतिरिक्त कार्यों का माध्यम समझ लिया गया है। शिक्षक संगठन लगातार यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें सम्मानजनक वातावरण दिया जाए और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए। आने वाले दिनों में यदि इस मुद्दे का समाधान नहीं हुआ, तो यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है।
फिलहाल शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन ने सरकार और प्रशासन से अपील की है कि जनगणना कार्य में लगे कर्मचारियों के साथ संवेदनशील और सहयोगात्मक रवैया अपनाया जाए। शिक्षकों का कहना है कि वे अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हट रहे, लेकिन सम्मान और उचित व्यवहार की उम्मीद करना उनका अधिकार है। यही सम्मान किसी भी व्यवस्था को मजबूत बनाता है और सरकारी कार्यों को सफल बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।