सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: टीईटी पास करना अब भी अनिवार्य, लेकिन शिक्षकों को मिली तीन साल की अतिरिक्त राहत

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: टीईटी पास करना अब भी अनिवार्य, लेकिन शिक्षकों को मिली तीन साल की अतिरिक्त राहत

देशभर के लाखों शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से यह उम्मीद जताई जा रही थी कि अदालत शायद टीईटी की अनिवार्यता पर कुछ राहत दे सकती है, लेकिन शुक्रवार को आए फैसले ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि सरकारी शिक्षकों को सेवा में बने रहने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करनी ही होगी। हालांकि अदालत ने शिक्षकों और राज्यों की व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए टीईटी पास करने की समयसीमा बढ़ाकर तीन वर्ष कर दी है। अब संबंधित शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी पास करना होगा।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ महीनों से देश के विभिन्न राज्यों में कार्यरत शिक्षकों और शिक्षक संगठनों के बीच इस मुद्दे को लेकर लगातार चर्चा चल रही थी। कई शिक्षकों को उम्मीद थी कि अदालत अपने पुराने फैसले पर पुनर्विचार कर सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों के भविष्य से जुड़ा यह विषय किसी भी प्रकार की ढील की अनुमति नहीं देता।

65 पुनर्विचार याचिकाएं खारिज, कोर्ट ने दोहराया अपना रुख

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इस मामले में दाखिल 65 पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में 2025 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी, जिसमें कहा गया था कि आरटीई अधिनियम, 2009 लागू होने से पहले नियुक्त और जिन शिक्षकों की सेवा में पांच वर्ष से अधिक समय शेष है, उन्हें निर्धारित अवधि के भीतर टीईटी पास करना होगा।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों पर टीईटी की शर्त लागू करना उचित नहीं है। उनका कहना था कि वर्षों का अनुभव रखने वाले शिक्षकों की योग्यता को केवल एक परीक्षा के आधार पर नहीं आंका जा सकता। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि टीईटी केवल एक औपचारिक परीक्षा नहीं है, बल्कि यह प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

शिक्षा की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम भी इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए बनाया गया है। ऐसे में यह आवश्यक है कि शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता मानक निर्धारित किए जाएं और उनका पालन सुनिश्चित किया जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तैयार करते हैं। इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि प्रत्येक शिक्षक निर्धारित योग्यता मानकों को पूरा करे। कोर्ट का मानना है कि टीईटी परीक्षा शिक्षकों की बुनियादी शैक्षणिक क्षमता और शिक्षण कौशल का मूल्यांकन करने का एक महत्वपूर्ण साधन है।

क्या पुराने शिक्षकों पर नियम लागू करना पूर्वव्यापी कानून है?

सुनवाई के दौरान एक प्रमुख तर्क यह भी दिया गया कि पुराने शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू करना कानून का पूर्वव्यापी (Retrospective) उपयोग माना जाएगा। इस तर्क को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

पीठ ने कहा कि आरटीई अधिनियम में पहले से ही यह स्पष्ट प्रावधान मौजूद है कि सेवा में कार्यरत शिक्षक भी निर्धारित समय के भीतर आवश्यक शैक्षणिक योग्यता प्राप्त करेंगे। इसलिए इसे कानून का पूर्वव्यापी प्रयोग नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, यह व्यवस्था शुरू से ही कानून का हिस्सा रही है और इसका उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना है।

नौकरी जाने की आशंका पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

कई शिक्षक संगठनों ने यह चिंता व्यक्त की थी कि यदि बड़ी संख्या में शिक्षक टीईटी पास नहीं कर पाए तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। इस पर अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कोई फैसला नहीं बदला जा सकता कि बड़ी संख्या में लोग प्रभावित होंगे।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना आवश्यक योग्यता वाले शिक्षकों को लंबे समय तक सेवा में बनाए रखना बच्चों के शैक्षिक भविष्य के साथ समझौता करने जैसा होगा। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरटीई अधिनियम एक बाल-केंद्रित कानून है और इसकी व्याख्या भी बच्चों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए की जानी चाहिए।

शिक्षकों को मिली राहत, समयसीमा बढ़कर हुई तीन वर्ष

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों की व्यावहारिक समस्याओं को भी गंभीरता से स्वीकार किया। अदालत ने माना कि कई राज्यों में नियमित रूप से टीईटी परीक्षाएं आयोजित नहीं हो रही हैं। इसके अलावा लाखों शिक्षकों को परीक्षा में शामिल कराने की प्रक्रिया भी चुनौतीपूर्ण है।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने टीईटी पास करने की समयसीमा दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष कर दी। अब संबंधित शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी उत्तीर्ण करना होगा। लेकिन अदालत ने साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि इसके बाद समयसीमा में किसी प्रकार का और विस्तार नहीं किया जाएगा।

राज्यों को दिए महत्वपूर्ण निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और संबंधित शिक्षा विभागों को निर्देश दिया है कि टीईटी परीक्षा नियमित रूप से आयोजित की जाए। अदालत ने सुझाव दिया कि परीक्षा वर्ष में कम से कम दो बार कराई जानी चाहिए ताकि शिक्षकों को पर्याप्त अवसर मिल सकें।

यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई राज्यों में समय पर टीईटी आयोजित नहीं होने के कारण शिक्षक परीक्षा में शामिल ही नहीं हो पाते थे। अब नियमित परीक्षा होने से शिक्षकों को तैयारी और सफलता दोनों के बेहतर अवसर मिल सकेंगे।

Leave a Comment